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लुटेरे

हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों को होटल में ही रहने दिया और समुद्र के किनारे आ गए। दूर-दूर तक फैला समुद्र का अनंत विस्तार। शहर की भागदौड़ भरी व्यस्त दुनिया से जुदा यह सुकून की दुनिया थी और पिछले एक सप्ताह से हम यहां के एक होटल में ठहरे थे। आखिर कल उसी भीड़ में फिर से लौट जाना था।
सागर किनारे दूर तक फैली रेत पर अपने अंतिम निशान छोड़ जाने के लिए हम बहुत दूर तक चले आए। विशाल ने जूट के थैले में रखी बीयर की दोनों बोतलें निकाल लीं और हम एकांत में आती हुई लहरों के सम्मुख जा बैठे। अपनी चाबी के छल्ले में लगे ओपनर से विशाल ने बीयर का ढक्कन खोला और मेरी ओर बढ़ा दिया। अपनी-अपनी बोतलें थामे हम आती हुई लहरों को गिनने का विफल प्रयत्न करने लगे। बीयर धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। इस बीच हमने गौर किया कि कुछ युवक और अधेड़ हम पर निगाहें रखे हुए हैं! न जाने कहां से आकर उन्होंने मानो हमें अपने घेरे में ले लिया था। दिखने में गरीब, कृशकाय- हम पर भारी। वे पांच थे और हम दो। उनकी निगाहें हम पर टिकी हुई थीं। बस, किसी मौके की तलाश में थे।
मैंने विशाल के चेहरे की ओर देखा। वहां हवाइयां उड़ रही थीं। मैं भी मन ही मन बहुत डर गया। गले में पड़ी सोने की चैन कॉलर में छिपाने की कोशिश की। विशाल ने धीरे से कहा, 'जितना पी सकते हो, पी लो। बोतल फेंको और यहां से खिसको। ’
मैं सुरूर में था। अपनी दायीं पेंट की जेब पर इस तरह हाथ मारा जैसे वहां पिस्तौल हो। पिस्तौल था नहीं। मोबाइल पर हाथ पड़ा। उसे निकालकर लहराते हुए उन्हें डपटा, 'क्या है? भागो यहां से। ’ वे सकपकाए और हमसे कुछ दूर हट गए, पर उनकी निगाह अब भी हम पर थी। मैंने बीयर का अंतिम घूंट भरते हुए कहा, 'विशाल, बोतल फेंको और भागो। ’
हमने बीयर की खाली बोतलों को वहीं रेत पर फेंका और अपने होटल की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने लगे। वहां से हटे ही थे कि देखा वे चारों छीना-झपटी करते हुए खाली बोतलों पर टूट पड़े हैं।

लघुकथा: ईसा की वापसी

ईसा की वापसी




दोस्तोएवस्की/ अनुवादः रतन चंद ‘रत्नेश’

Story Update : Saturday, December 24, 2011    9:22 PM
अपनी मौत के अट्ठारह सौ साल बाद एक दिन स्वर्ग में बैठे ईसा को ख्याल आया कि चलकर देखना चाहिए कि धरती पर उनके प्रशंसक और श्रद्धालु अब उन्हें किस नजर से देखते हैं। अतः धरती पर वे अपनी मातृभूमि येरूशलम के गांव में प्रकट हुए।

सुबह की प्रार्थना के बाद श्रद्धालु चर्च से वापस लौट रहे थे। एक पेड़ के तले खड़े ईसा को देखकर वे बहुत हैरान हुए। वे उनके पास पहुंचे और पूछा, ‘आप कौन हैं श्रीमान? ईसा बनकर यहां क्यों खड़े हो?’

ईसा ने प्रत्युत्तर में कहा, ‘मैं ईसा ही हूं।’

सुनकर श्रद्धालु हंस पड़े, ‘भाग जा यहां से। हमारा पादरी आता ही होगा। तुम्हारी शामत आ जाएगी।’

‘पादरी तुम्हारा है या मेरा? मुझे पहचानो। मैं वही हूं जिसकी प्रार्थना कर तुम लोग चर्च से आ रहे हो।’
‘ठीक है वह देखो..... हमारा पादरी आ रहा है।’

तभी पादरी वहां पहुंचे और कहा, ‘यह फरेबी कौन है ?’

पादरी के आदेश पर ईसा को एक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया गया। रात होने पर पादरी वहां आया और ईसा के पांव छूकर कहने लगा, ‘मैंने आपको पहचान लिया था, प्रभु लेकिन आप पुनः यहां रहेंगे, तो वही पहले वाली गड़बड़ी हो जाएगी। फलस्वरूप फिर से हमें वही सब करना पड़ेगा, जो हमने अठारह सौ साल पहले किया था।’                                                  (साभार 'अमर उजाला' दिनांक : २५ दिसम्बर २०११ )


लघुकथा


          लुटेरे
हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों को होटल में ही रहने दिया और समुद्र के किनारे आ गए। दूर-दूर तक फैला समुद्र का अनंत विस्तार। शहर की भागदौड़ भरी व्यस्त दुनिया से जुदा यह सुकून की दुनिया थी और पिछले एक सप्ताह से हम यहां के एक होटल में ठहरे थे।
आखिर कल उसी भीड़ में फिर से लौट जाना था।
सागर किनारे दूर तक फैली रेत पर अपने अंतिम निशान छोड़ जाने के लिए हम बहुत दूर तक चले आए। विशाल ने जूट के थैले में रखी बीयर की दोनों बोतलें निकाल लीं और हम एकांत में आती हुई लहरों के सम्मुख जा बैठे। अपनी चाबी के छल्ले में लगे ओपनर से विशाल ने बीयर का ढक्कन खोला और मेरी ओर बढ़ा दिया। अपनी-अपनी बोतलें थामे हम आती हुई लहरों को गिनने का विफल प्रयत्न करने लगे। बीयर धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। इस बीच हमने गौर किया कि कुछ युवक और अधेड़ हम पर निगाहें रखे हुए हैं! न जाने कहां से आकर उन्होंने मानो हमें अपने घेरे में ले लिया था। दिखने में गरीब, कृशकाय- हम पर भारी। वे पांच थे और हम दो। उनकी निगाहें हम पर टिकी हुई थीं। बस, किसी मौके की तलाश में थे।
मैंने विशाल के चेहरे की ओर देखा। वहां हवाइयां उड़ रही थीं। मैं भी मन ही मन बहुत डर गया। गले में पड़ी सोने की चैन कॉलर में छिपाने की कोशिश की। विशाल ने धीरे से कहा, 'जितना पी सकते हो, पी लो। बोतल फेंको और यहां से खिसको।
मैं सुरूर में था। अपनी दायीं पेंट की जेब पर इस तरह हाथ मारा जैसे वहां पिस्तौल हो। पिस्तौल था नहीं। मोबाइल पर हाथ पड़ा। उसे निकालकर लहराते हुए उन्हें डपटा, 'क्या है? भागो यहां से। वे सकपकाए और हमसे कुछ दूर हट गए, पर उनकी निगाह अब भी हम पर थी। मैंने बीयर का अंतिम घूंट भरते हुए कहा, 'विशाल, बोतल फेंको और भागो।
हमने बीयर की खाली बोतलों को वहीं रेत पर फेंका और अपने होटल की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने लगे। वहां से हटे ही थे कि देखा वे चारों छीना-झपटी करते हुए खाली बोतलों पर टूट पड़े हैं।                                                                                                                      ( अमर उजाला   में प्रकाशित )                                 

लघुकथा: समय के पाबंद

रेखांकन: रतन चंद 'रत्नेश'
वह डाकघर पहुंचा। जेब से दस रुपए का नोट निकालकर काउंटर पर बैठी महिला की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘मैडम, पांच-पांच रुपए के दो स्टैम्प दे दीजिए।’
महिला ने तपाक से कहा, ‘ढ़ाई बज गए हैं और अब यह लंच-आवर है।’
‘पर मैडम अभी तो दो बजने में पांच मिनट रहते हैं।’ उसने अपनी कलाई घड़ी पर एक निगाह डालते हुए कहा।
‘सामने दीवार-घड़ी की ओर देखो, दो बज चुके हैं। हमने सरकारी घड़ी के अनुसार चलना है न कि आपके।’
उसने दीवार घड़ी पर निगाह डाली। ठीक दो बज रहे थे।
इसी बीच महिला ने काउंटर छोड़ दिया। वह भी डाकघर से निकलकर घर की ओर चल पड़ा। सोचा, लंच के बाद वापस दफ्तर लौटते समय डाकटिकट ले लेगा।
दो बजकर पैंतीस मिनट पर जब वह फिर से  डाकघर पहुंचा तो काउंटर पर महिला मौजूद नहीं थी। उसने डाकघर की दीवार-घड़ी देखी। दो बजकर चालीस मिनट हो रहे थे। उसे मजबूरन इंतजार करना पड़ा। अंततः कुछ देर बाद महिला काउंटर पर नमूदार हुई।
उसने दस रुपए का नोट आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘मैडम, लंच-आवर ढाई बजे तक था और अब दो चालीस से ऊपर हो गए हैं।’

महिला ने अपने हाव-भाव कुछ यों बनाए जैसे उसने कुछ सुना ही न हो।

लघुकथा: पूजा-पाठ

उनके सितारे इन दिनों गर्दिश में थे। ज्योतिषाचार्य  ने सुझाया कि अमुक देवता को प्रसन्न करने के लिए अमुक दिन मंदिर में विशेष  पूजा-पाठ कराएं। लगे हाथों ज्योतिष  ने मंदिर के पुजारी को मोबाइल पर  पूजा का दिन भी निश्चित  कर दिया।
प्रसन्नमना वे उस दिन मंदिर में थे। अपनी कार से पूजा-सामग्री और परसाद का टोकरा उतरवा रहे थे कि एक भिखारी सामने आकर गिड़गिड़ाने लगा -----
‘‘भगवान आपकी सारी मिन्नतें पूरी करें, साब। घर खुशियों  से भर जाय।...... कल शाम से कुछ नहीं खाया........... ।’’ कहकर उसने ज्योंहि अपना हाथ आगे बढ़ाया कि वे झट से दो कदम पीछे हट गए और बरस पड़े----
‘‘अभी पूजा-पाठ हुआ नहीं कि आ धमके। सुबह-सुबह न जाने कहां से आ जाते हैं कमबख्त।’’

लघुकथा- बराबरी



गांव से लाकर सुबह-सुबह ताजी मूली, पालक, मेथी और सरसों का साग बेचने वाला सुक्खा पॉश  कॉलोनी के आलीशान बंगलों के मुख्यद्वारों पर हाँक लगाता, ‘‘मेथी ले लो....... ताजी पालक.......साग-सब्जियां.....’’

इन आलीशान बंगलों में साइकिल पर लदी उसकी हरी-हरी सब्जियाँ घंटे भर में बिक जातीं। एक उच्चाधिकारी की पत्नी रश्मि मैडम तो आये दिन उससे ही पालक-मेथी लेती और इस क्रम में वह सुक्खा से भलीभांति परिचित हो गयी थी। कभी-कभी वह सब्जियाँ खरीदते समय उसके घर और बाल-बच्चों का हाल-चाल भी पूछ लेती। इससे थके हुए सुक्खा को बड़ी राहत मिलती और हार्दिक प्रसन्नता भी।

‘‘बड़े लड़के की पढ़ाई कैसी चल रही है सुक्खा ? इस बार तो वह मैट्रिक की परीक्षा देगा न ?’’ एक दिन उन्होंने सुक्खा से पूछा।

‘‘हां, बीबी जी। बड़ी मेहनत कर रहा है। हमेशा  से अच्छे नंबरों से पास होता आया है। स्कूल में मास्टर जी भी उसकी बड़ा तारीफ करते है।’’

रेखांकन: रतन चंद 'रत्नेश'
‘‘अच्छी बात है। पढ़-लिखकर नौकरी में लग गया तो आगे चलकर तुम्हारा सहारा बनेगा’’

सौभाग्य से सुक्खा का बेटा जिले भर में प्रथम आया। लोगों की बधाइयों से वह फूला न समाया सुक्खा एक दिन मिठाई का डिब्बा लिये रश्मि  मैडम के द्वार पर जा उपस्थित हुआ।

‘‘बीबी जी, मेरा बेटा जिले भर में अव्वल आया है। अखबारों में उसकी फोटो भी छपी है। इसी खुशी  में आपके लिए मिठाई लाया हूँ।’’

रश्मि मैडम ने मिठाई का डिब्बा स्वीकार करते हुए प्रसन्नता जाहिर की और उसे बधाइयाँ दीं। फिर पूछा, ‘‘लड़के को आगे क्या कराने का विचार है सुक्खा ?’’

‘‘बीबी जी, मैं ने तो अब ठान लिया है कि जैसे भी हो, चाहे पुश्तैनी  जमीन ही क्यों न बेचनी पड़े,, मैं अपने बेटे को आप लोगों जैसा बड़ा अफसर बनाऊंगा।’’ सुक्खा ने उत्साहित होते हुए कहा।

ऐसा सुनना ही था कि रश्मि  बीबी जी के माथे पर विद्वेष  की त्योरियाँ चढ़ गयीं और सुक्खा के जाते ही उसने मिठाई का डिब्बा मुख्यद्वार के बाहर रखे कूड़े दान में फेंक दिया।





लघुकथा- गांधीगिरी




सरकारी कार्यालय में महीनों से अटके पड़े अपने काम को करवाने का नुस्खा बुजुर्ग के हाथ लग चुका था।
वे सम्बंधित रिश्वतखोर बाबू के पास पहुंचे और एक-एक कर अपनी ऐनक, टोपी, कमीज, बनियान, पतलून उतारने लगे। बाबू चुपचाप उन्हें देखे जा रहा था। उसके चेहरे पर न कोई सिकन थी और न कोई प्रतिक्रिया।
हारकर बुजुर्ग ने अपना अंतर्वस्त्र  भी उतारकर उसके टेबल पर रख दिया।

उस दिन से बुजुर्ग अस्पताल के मनोरोग विभाग में दाखिल हैं।

लघुकथा: गुरुदक्षिणा



‘‘क्या समय आ गया है, आज के छात्र अपने गुरु को सम्मान ही नहीं देते जबकि एक समय वह था जब गुरु देव-तुल्य पूजे जाते थे।’’
एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों से कह रहे थे।
तभी एक विद्यार्थी खड़ा होकर कहने लगा ---
‘‘सचमुच समय बदल गया है गुरु जी। पहले शिक्षा  व्यवसाय नहीं था जबकि आज के शिक्षक शिक्षा का दान नहीं देते बल्कि पैसे के लिए उसे बेचते हैं। ट्यूशन के लिए निर्धारित ‘रेट’ भी हैं जैसा कि किरयाने की दुकान में होता है।’’
सुनकर शिक्षक महोदय बगलें झांकने लगे।

लघुकथा- भलाई

भरी दोपहर में एक बच्चा गली के एक कोने में खड़ा रोये जा रहा था। गर्मी का मौसम था। आसमान में बादल छाये होने के कारण धरती तो सामान्य गर्म थी पर वातावरण उमस से भरा था।
वह पसीने से तरबतर कहीं से लौट रहा था। सिर के बाल अस्त-व्यस्त थे। उसे जोरों की प्यास लगी थी। थकान के चिह्न चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।
वह बच्चे की ओर बढ़ा। सड़े-गली सुनसान थी। उसने साइकिल रोककर बच्चे से पूछा----
‘‘क्यों रो रहे हो बेटे ?’’
‘‘..............’’
Photo by Ratan Chand 'Ratnesh'
‘‘घर भूल गए हो क्या ?’’
‘‘................’’
‘‘भूख लगी है ?’’
‘‘................’’
बच्चे ने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा। साइकिल खड़ी कर उसने बच्चे को गोद में उठाया और चिंतित  होकर इधर-उधर देखने लगा। उसने सोचा, पता नहीं किसका बच्चा है ? अब किससे पूछे ? इस भरी दोपहर में अब किस-किसका दरवाजा खटखटाए ?
बच्चा रोना बंद करके अब सुबकने लगा था। तभी पास ही एक मकान के बाहर एक औरत नज़र आयी। बच्चे को साइकिल के पीछे बिठाकर वह उधर ही बढ़ने लगा।
उसी समय  पीछे से दो-तीन लोग दौड़े आए। एक ने बच्चे को झपट कर गोद में ले लिया। दूसरे ने उसकी साइकिल छीनकर एक ओर फेंक दी और लगे बिना सोचे-समझे उसे पीटने।
‘‘साले, बच्चे को उठाकर ले जा रहा था।’’

दो टके की नौकरी

बाबू हरकिशन लाल झंडे-बैनरों से सजी-धजी अपनी कार से उतरे। वे अभी-अभी चुनाव-प्रचार से लौटे हैं। अंततः बड़ी मेहनत-मशक्कत के बाद वे इस बार पार्टी का टिकट हासिल करने में कामयाब हो पाए हैं।
अपने आलीशान बंगले में प्रवेश करते ही वे चिल्लाये---
‘‘कहाँ है रामकिशन? जल्दी से भेजो उसे मेरे पास।’’
ढूँढकर उनके युवा बेटे को हाजिर किया गया।
‘‘कहाँ रहते हैं जनाब, दिखते ही नहीं इन दिनों ?’’ उन्होंने बेटे से पूछा।
‘‘पिताजी, फाइनल की परीक्षा सर पर है, उसी में जुटा हूँ । साथ ही इस बार आई.ए.एस. में बैठने की तैयारी भी कर रहा हूँ।’’
बेटे की बात सुनकर बाबू हरकिशन लाल भन्नाए---
‘‘लो सुनो इसकी बात। चुनाव सामने है और इसे पढ़ाई की पड़ी है। ये नहीं कि बाप का हाथ बँटाए। घर में घुसा किताबें चाट रहा है कमबख्त। कोई समझाए इसे।......... अरे भई मेरे चुनाव-प्रचार में जोर-शोर से जुट जा। मैं जीत गया तो तुझे दो टके की नौकरी के लिए इस तरह किताबों में मगज खपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी...... समझे।’’

लघुकथा: अनपढ़

अपनी कोठी में कुछ काम कराने के लिये बाबू रामदयाल पास ही के चौराहे से एक मजदूर को पकड़ लाए। वह एक लुंगी और पुराने सी जगह-जगह से पैबंद किये हुए कुरते में था।
बाबू रामदयाल उसे लेकर पैदल ही आ रहे थे। उन्होंने पूछा, ‘‘क्या नाम है तेरा ?’’
  ‘‘जी बाबू..... सुखी राम।’’
बाबू रामदयाल मन-ही-मन मुस्कराये, उसके नाम पर शायद।
रास्ते में एक जगह मस्जिद के सामने थोड़ी देर रुककर सुखी राम माथा टेकने की मुद्रा में खड़ा हो गया।
बाबू रामदयाल को आश्चर्य हुआ और वे अपनी त्योरियां चढ़ाते हुए बोले ---
  ‘‘क्यों बे, तू मुसलमान है क्या ?’’
 ‘‘नहीं-नहीं बाबू..... हम तो हिन्दू हैं।’’
  ‘‘तो फिर मस्जिद के सामने सर काहे लिए नवां रहा है ?’’
सुखी राम ने सहजभाव से कहा ---
  ‘‘हम तो अनपढ़-गंवार है बाबू जी। हमार खातिर का मस्जिद और का मंदिर, सब एक ही हैं। इनका भेद तो आप जैसे पढ़े-लिखन लोगन को ही ज्यादा पता है।’’


लघुकथा : हैसियत


रेखांकन- रत्नेश 
वह कार की चपेट में आते-आते बचा। कार वाला जाते-जाते कह गया, ‘‘अबे मरना है तो क्या हमारी गाड़ी ही रह गई।’’
बुड़बुड़ाते हुए उसने जाते हुए कार को गुस्से से देखा, ‘‘गाड़ी में बैठ जाते है तो अपने को न जाने क्या समझने लगते हैं, जैसे सड़क इनके बाप की हो।’’
वह आगे बढ़ा। थोड़ी ही दूर निकला कि एक बूढ़ा सड़क पार करते हुए उसकी साइकिल से टकराते-टकराते बचा। वह चीखा----
‘‘अंधे हो क्या, देखकर नहीं चल सकते?’’
उसने बूढ़े को घूरकर देखा और आगे बढ़ गया।

लघुकथा- मेरे अपने

दूसरे शहर में रहने के कारण छः माह बाद मैं उनके घर जा पाया। घर क्या, यह सारा का सारा कस्बा पहले पिछड़ी गिनती में आता था। अब तो आधुनिकता का मुलम्मा चढ़ चुका है इस पर।
रिटायर का जीवन बसर कर रहे मेरे करीबी रिश्तेदार और उनकी धर्मपत्नी ने बेहद संक्षिप्त-सा कुशलक्षेम पूछा और बिना मेरी उत्तर की प्रतीक्षा किए दूरदर्शन का हर रोज आने वाले धारावाहिक देखते रहे।
मुझे नागवार लगा। तभी लगा कि उस धारावाहिक के एक पात्र ने मेरी ओर उंगली उठायी और व्यंग्यात्मक लहजे में जैसे मुझे ही कहने लगा हो--
‘‘तुम से अज़ीज अब मैं हूं इनके लिए। मैं यहां हर रोज आता हूं। तुम तो एक अर्से बाद यहां आए हो। बोलो... तुम ही बोलो, इनके करीब मैं अधिक हूं या तुम?... बोलो, चुप क्यों हो?’’
मैं मन-ही-मन बुदबुदाया, ‘‘फिर भी तुम कभी इनके दुःख-दर्द में काम नहीं आ सकते। एक जीता जागता आदमी ही आदमी का भला कर सकता है।’’
‘‘भला... (वह ठहाके लगाता है), अरे भाई,बुरा कहो, बुरा। आजकल कौन किसी के भले की सोचता है। फुर्सत है ही किसके पास? तुम अपने आप को ही लो। लगभग छः माह बाद आए हो यहां। इनका दुःख-दर्द किसने बांटा, मैंने या तुमने? आदमी जब जी चाहे मुझसे खेल सकता है। अपना मन बहला सकता है। दुःख में रोता है मेरे साथ, सुख में हंसता है मेरे साथ।’’
दोनों पति-पत्नी की आंखे टीवी के पर्दे पर पल-पल बदलते दृष्य पर गड़ी हुई हैं। चेहरे पर कई रंग आ रहे हैं, कई जा रहे हैं।
मैं अपने आप को उपेक्षित महसूस करता टीवी के पात्रों से बहुत बौना समझने लगा और घोर विवशता में धारावाहिक के समाप्त होने की व्याकुलता से प्रतीक्षा करता रहा।
इसी बीच ‘आफटर द ब्रेक’ की कड़क चाय की गर्म भाप स्क्रीन पर उठने लगी। महिला ने मुझसे पूछा, ‘‘चाय अभी पीओगे या ठहरकर?’’
मैंने अनुमान लगाया कि वह अभी चाय बनाने की जहमत नहीं उठाना चाहती थी। धारावाहिक के सारे पात्र उसके अपने हो चुके थे। वह किसी के प्रति अन्याय कैसे कर सकती थी भला?
अचानक नायिका का बूढ़ा बाप पागलों जैसी हरकतें करता स्क्रीन पर उभरता है।
मैं बैठा-बैठा अधीर हो उठता हूं। इतने दिनों बाद दूसरे शहर से इनके पास आया पर ये धारावाहिक के पात्रों का मन टटोलने में व्यस्त हैं। जी में आ रहा था उठकर चल दूं यहां से।
थोड़ी देर में वही नायक पुनः पर्दे पर अवतरित होता है जिसने अपने सामने मेरी औकात बता दी थी।
‘‘क्यों मियां, क्या कहते हो? मैं इनके करीब हूं या तुम?’’
मैं आंखें चुराकर उस कमरे से निकल बाहर खुली हवा में आ जाता हूं और एक हुदहुद को चीड़ के वृक्ष की टोह लेते हुए देखने लगता हूं। (रत्नेश)

चीनी लघु कथा- परस्पर सहयोग

श्रीमान ई पिछले कई वर्षों से साहित्य की दुनिया में संघर्षशील थे, पर आज तक उन्हें कोई प्रसिद्धि  नहीं मिल पाई । उन्होंने अपने सारे सम्पर्कों का लाभ उठाया, फ़िर भी शोहरत नहीं मिली । एक दिन उनकी मुलाकात प्रसिद्ध  आलोचक च्यांग से हुई। उन्होंने च्यांग महोदय को अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया। श्रीमान ई की मेहमानवाजी से प्रसन्न होकर च्यांग ने कहा, ‘आपकी बेकद्री अच्छी बात नहीं है। मैं आपके बारे में एक प्रशंसात्मक लेख लिखूंगा और उसे किसी प्रसिद्द समाचार- पत्र या पत्रिका में प्रकाशित करवाऊँगा । आपकी रचनाओं की तुलना...।’
आलोचक च्यांग की बात पूरी होने के पूर्व ही श्रीमान ई बोल उठे, ‘कृपया आप मेरी रचनाओं की प्रशंसा न करें। मैं विनती करता हूं कि आप मेरी रचनाओं की आलोचना करें। अपने पिछले दस वर्षों की जानकारी के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आपने जिन कृतियों की आलोचना की है, वे देश-विदेश में प्रसिद्ध  हुई हैं। इससे आपका मान भी बढ़ेगा और पैसे भी मिलेंगे। इसे ही परस्पर सहयोग कहते हैं।


गिरिराज  ९-१५ जून २०१० में प्रकाशित

लघुकथा - बेबसी


अंतत: दोनों भाइयों ने बस में पांच सीटें  बुक कराई! सबसे पीछे की । दो अपने लिए और तीन मां ·के लिए। मां बहुत बीमार थी। वह लेट कर ही वापस गांव  जा सकती थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था और साथ ही यह भी कहा कि  घर पर ही जितनी सेवा हो सकती है, करो।

बड़ा भाई दिल्ली में ही काम करता था। उसके पास जो कुछ जमा-पूंजी थी, मां के इलाज में खप गई। पैसे होते, तो वह मां को किसी टेक्सी में ले जाता।

दोनों बेटों के बीच मां आंखे मूंदे सो रही थी। बस ने आधे से अधिक फासला तय कर लिया था। तीन सीटों की  टिकट लेने के कारण खड़े रहने को  विवश किसी यात्री से तकरार भी नहीं हुई। कंडक्टर भी उनके  ही इलाके का था। उसी ने सलाह दी थी कि इसी तरह बीमार मां गांव पहुंच सकती है, वरना रास्ते में सवारियां हील-हुज्जत करेगी।

अचानक मां की  देह में  जुंबिश हुई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। पिछली सीट पर बैठे दोनो भाइयों ने  एक दूसरे की ओर कातर निगाह से  देखा। बड़े भाई ने अपने होठों पर उंगली रखकर छोटे को  चुप रहने का इशारा किया। छोटे भाई की आंखों में  आंसू तैरने  लगे । उसका जी कर रहा था कि मां की मौत पर दहाड़ मार-मार कर रोए, पर परिस्थिति   को समझ कर  वह घुटा-घुटा आंसू बहाता रहा और थोड़ी देर में चुप हो गया।

लघुकथा -- लुटेरे


लुटेरे
 
हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों को होटल में ही रहने दिया और समुद्र के किनारे आ गए। दूर-दूर तक फैला समुद्र का अनंत विस्तार। शहर की भागदौड़ भरी व्यस्त दुनिया से जुदा यह सुकून की दुनिया थी और पिछले एक सप्ताह से हम यहां के एक होटल में ठहरे थे। आखिर कल उसी भीड़ में फिर से लौट जाना था।
सागर किनारे दूर तक फैली रेत पर अपने अंतिम निशान छोड़ जाने के लिए हम बहुत दूर तक चले आए। विशाल ने जूट के थैले में रखी बीयर की दोनों बोतलें निकाल लीं और हम एकांत में आती हुई लहरों के सम्मुख जा बैठे। अपनी चाबी के छल्ले में लगे ओपनर से विशाल ने बीयर का ढक्कन खोला और मेरी ओर बढ़ा दिया। अपनी-अपनी बोतलें थामे हम आती हुई लहरों को गिनने का विफल प्रयत्न करने लगे। बीयर धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। इस बीच हमने गौर किया कि कुछ युवक और अधेड़ हम पर निगाहें रखे हुए हैं! न जाने कहां से आकर उन्होंने मानो हमें अपने घेरे में ले लिया था। दिखने में गरीब, कृशकाय- हम पर भारी। वे पांच थे और हम दो। उनकी निगाहें हम पर टिकी हुई थीं। बस, किसी मौके की तलाश में थे।
मैंने विशाल के चेहरे की ओर देखा। वहां हवाइयां उड़ रही थीं। मैं भी मन ही मन बहुत डर गया। गले में पड़ी सोने की चैन कॉलर में छिपाने की कोशिश की। विशाल ने धीरे से कहा, 'जितना पी सकते हो, पी लो। बोतल फेंको और यहां से खिसको।
मैं सुरूर में था। अपनी दायीं पेंट की जेब पर इस तरह हाथ मारा जैसे वहां पिस्तौल हो। पिस्तौल था नहीं। मोबाइल पर हाथ पड़ा। उसे निकालकर लहराते हुए उन्हें डपटा, 'क्या है? भागो यहां से। वे सकपकाए और हमसे कुछ दूर हट गए, पर उनकी निगाह अब भी हम पर थी। मैंने बीयर का अंतिम घूंट भरते हुए कहा, 'विशाल, बोतल फेंको और भागो।
हमने बीयर की खाली बोतलों को वहीं रेत पर फेंका और अपने होटल की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने लगे। वहां से हटे ही थे कि देखा वे चारों छीना-झपटी करते हुए खाली बोतलों पर टूट पड़े हैं।             साभार : अमर उजाला                                     

लघुकथा- समस्या




गाँव में जाने पर सारी दिनचर्या बदल जाती है। समय से बँधे रहने के सिलसिले में भी पूर्णविरामसा लग जाता है। कोई आपाधापी और कोई तनाव। यहाँ तक कि दुनिया में कहाँ क्या हो रहा है, यह जानने की भी चिन्ता नही सताती। ही समाचारपत्रों को नियम से देखने का चाव रहता है और ही रेडियोटीवी से चिपककर बैठने का।
वैसे भी गाँव के समीप बसअड्डे पर छितराई हुई दुकानों में समाचारपत्र बहुत देर से पहुँचते हैं। तब तक हम जैसे लोगों का पढ़ने का मज़ा ही जाता रहता है जिन्हें अलस्सुबह समाचारपत्र बाँचने की आदत हो।
एक दिन मैं यों ही पूरन की दुकान पर बैठा चाय की चुस्कियाँ ले रहा था कि आने वाली बस से दलीपा राम जी उतरे। वे हमारे गाँव के प्राइमरी स्कूल के शिक्षक हैं। मुझे इल्म था कि इन दिनों वे अपनी पुत्री के लिए किसी योग्यवर की तलाश में हैं। वे मुझे भी अपनी बिरादरी का कोई लड़का शहर में देखने के लिए कह चुके थे।
उन्हें देखते ही मैंने पूछा, ‘‘मास्टर जी, कहाँ से तशरीफ ला रहे हैं ?’’
‘‘
बस पास ही के एक गाँव में गया था।’’
मैं उठकर उनके समीप जा पहुँचा।
‘‘
कोई लड़का मिला ?’’ मैंने पूछा।
‘‘
उसी सिलसिले में तो गया था।’’
’‘
फिर ... बात बनी कोई ?’’
‘‘
वैसे तो सब ठीक है पर.....’’
‘‘
क्या दहेजवहेज का कोई अड़ंगा ?’’
‘‘
नहींनहीं.. ऐसा कुछ नहीं है। लड़का भी ठीक है, सरकारी नौकरी पर है, घरबार भी प्राय: ठीक ही है...’’
‘‘
तो फिर कौनसी समस्या आड़े रही है, मास्टर जी?’’
‘‘
बस, लड़के को नौकरी में ऊपरी कमाई कोई नहीं है। आपको तो पता ही है कि आजकल सरकारी नौकरी में ऊपरी कमाई हो तो.......’’ 


लघुकथा- दर्द




अभीअभी इंटरव्यू देकर वह एक दफ्तर से निकला था। इंटरव्यू तो इस बार भी अच्छा हुआ था पर....?
इसके पूर्व भी उसके कई इंटरव्यू अच्छे हुए थे पर नौकरी अभी तक हासिल नहीं कर पाया था।
थकाथकासा वह बसस्टैंड की ओर बढ़ रहा था। भूख भी जोरों की लग आयी थी। सोचा, घर शीघ्र पहुँचकर वह भोजन कर लेगा। माँ भी प्रतीक्षा कर रही होगी। लोगों के कपड़े सीसीकर थक जाती है बेचारी।
उसकी जेब में दस रुपए थे। सात रुपए बस का किराया ही लग जाना था। पैदल चले तो बहुत देर से पहुंचेगा। भूखी माँ हारकर फिर काम में जुट जाएगी।
उसका पेट भूख से बिलबिलाने रहा था। एक केला ही खा लूँ, सोचकर वह एक केले वाले की ओर बढ़ा।
तभी एक छोटासा लड़कासाहब पॉलिश करा लोकहता हुआ उसके सामने खड़ा हुआ। उसे क्षण भर कि लिए लगा कि वह सचमुच साहब हो गया है। एक नौकरीशुदा साहब।
उसने अपने पुराने पड़ गए जूतों पर एक निगाह डाली और सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘नहीं करानी है भई पॅलिश।’’
‘‘
करा लो बाबू जी।’’ वह लड़का गिड़गिड़ाने लगा। उसका स्वर दयनीय हो उठा था।
उसे महसूस हुआ जैसे उसके अन्दर से कोई कह रहा हो––
‘‘
हमारे घर की दशा अच्छी नहीं है साहब। मुझे नौकरी पर रख लीजिए।’’
उसकी आँखें नम हो आयीं। उसने एक निगाह घड़ी पर डाली और पॉलिश के लिए अपने जूते उस लड़के की ओर बढा दिए  
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