कहानी- रातरानी का खिला हुआ चेहरा

फोटो- दीपक अरोड़ा
धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि कोई छाती पर बैठा उसकी गर्दन दबाए जा रहा है। आंख खुली तो सांस घुटती नज़र आई और फेफड़े हवा के लिए फड़ाफड़ा रहे थे। उस फड़फड़ाहट से सारा कमरा गूँज  रहा था। पर्याप्त हवा होते हुए भी उसके फेफड़े सांस लेने और छोड़ने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे और उसे अपनी गर्दन की शिराएँ  फूलती और नसें फटती प्रतीत हो रही थीं। पीठ पर दाईं ओर एक असहनीय खींचाव का अनुभव पा रहा था वह । उसने अपनी विस्फारित आंखों से अंधेरे में ही इधर-उधर ‘इन्हेलर’ को टटोला पर उसे जहाँ होना चाहिए था, वह वहां नहीं था। उसने कमरे की बत्ती जला दी। इन्हेलर कहीं नहीं था। दिमाग पर जोर डाला। ख्याल आया कि वह उसके काले रंग की पैंट की जेब में है और उसने आज दोपहर बाद ही बस-स्टॉपेज पर बैठकर अपनी सांस में खींचा था।
छाती से अजीब-सी आवाज आ रही थी जो अब उसके लिए अजीब और अपरिचित नहीं रही थी। वह बिस्तर से उठा। कमर झुकाए उतारा और खूंटी पर टंगी पैंट को हाथ में दबाए पुनः बिस्तर पर लौट आया।
उसने पैंट की सारी जेबें टटोलीं, पर पर्स और चाबियों के गुच्छे के सिवा वहां कुछ न था। उसने फिर अपने दिमाग पर जोर डाला पर ख्याल नहीं आया कि बस-स्टॉपेज के बाद उसे इसकी जरूरत पड़ी हो। इन्हेलर के न मिलने के कारण कष्ट और अधिक बढ़ गया। यह सोचते ही घबराहट होने लगी कि कल सुबह कैमिस्ट की दुकान खुलने तक तो वह पस्त हो जाएगा। दवा तो थी पर उसे रात में इन्हेलर चाहिए, आराम से सोने के लिए । दवा लेने पर ऐसी अवस्था में कोई विशेष लाभ नहीं होता है।
उसे अपनी सांव उखड़ती-सी लगी। पीठ के पीछे का खींचाव इतना बढ़ चुका था कि उसे लगा कि उसकी पीठ की हड्डी टूटकर झटके से बाहर आ जाएगी।
वह उसी पैंट को पहनकर घर से बाहर निकल आया। सारा वातावरण शान्त था। कहीं इधर-उधर से बीच-बीच में गाड़ियों की आवाजें आतीं और उनमें लगातार गूंज रही थी उसकी छाती की खरखराहट। वह कमर को थोड़ा झुकाए सांस लेने और छोड़ने का प्रयत्न करता बिल्डिंग के तीसरे माले से नीचे उतर आया और एक रिक्शा  लेकर सरकारी अस्पताल की ओर  चल पड़ा। वहां पहुंचकर जैसे-तैसे इमरजैंसी तक गया। डॉक्टर ने उसके चेहरे की ओर देखा, कयास लगाया और फिर पूछा, ‘‘क्या तकलीफ है?’’
‘‘सांस लेने में.....।’’
इसी बीच डॉक्टर ने ‘अमीनोफाइलिन.... इन्ट्राविनस... वेरी स्लोली’ एक पर्ची पर लिखकर उसे पकड़ा दिया। वह नर्स के कमरे में पहुंचा। ड्यूटी पर मौजूद नर्स ने उसे पहचान लिया। वह हमेशा फूल-सी खिली दिखती है। इस समय रात के दूसरे प्रहर में भी दिख रही है। लिपस्टिक उसी तरह उसके अधरों पर सजी हुई है जिस तरह वह बाजार में साड़ी पहनकर सजी घूमती नजर आती है। वे एक दूसरे को जानते हैं। पहचान का माध्यम यही इंजेक्शन  है जो कुछ ही देर में वह उसकी धमनी में उतार देगी। वह कई बार यहां आकर अपनी धमनियों में इंजेक्शन  की सुई चुभवा चुका है। इत्तेफाक से यही नर्स उसे अधिक मिली है। संभवतः वह ही डॉक्टर से पर्ची बनवाकर उसे ढूंढने लगता है। वह बहुत धीरे-धीरे उसकी धमनी में इंजेक्शन  चुभाकर दवा बूँद-बूंद टपकाती है और शरीर व मन दोनों को ठंडक महसूस होती है। जब तक वह सुई निकालकर उसे लेटे रहने के लिए कहती है, तब तक उसका शरीर तनावमुक्त हो चुका होता है और से बड़ी प्यारी नींद आती है। वह नींद जो उससे जबरन छीन ली गई होती है। जब वह उसके करीब खड़े होकर धीरे-धीरे इंजेक्शन  दे रही होती है, उसे बड़ा अच्छा लगता है -- उसके सफेद कपड़े, उसका गोरा रंग और उसके लिपस्टिक-सने लाल होंठ। वह उसे इसलिए भी अच्छी लगती है कि उसे उसकी तकलीफ पर दुःख होता है। एक बार एक अन्य नर्स ने उसे इंजेक्शन  देना चाहा था तो उसकी धमनी से खून की धारा फूट पड़ी थी और उसकी सारी बांह खून से सन गई थी। पर वह नर्स जिसका वह नाम तक नहीं जानता, उसे कोई कष्ट नहीं होने देती। उसने मन ही मन उसका एक नाम भी रख लिया -- उर्वशी।
फोटो: दीपक अरोरा 
उसे देखते ही वह मुस्कुरायी। रात की पारी में वह रातरानी-सी खिली और सुगन्ध बिखेरती नजर आती। उसका  जी चाहता कि उसकी सांस भी स्वाभाविक चलती रहे और वह उसे सुन्दरी को लेकर भीड़-भरे बाजार में घूमे, जहां शाम ढलते ही सजे-धजे और अत्याधुनिक फैशन के कपड़ों में लिपटे लोग मौज-मस्ती में घूमते हुए नजर आते हैं। इस बाजर में किसी को भी दूसरों को देखने की फुर्सत नहीं होती। सब यही देखते हैं कि कौन  उसे देख रहा है। युवकों की आशिकाना  नजरें तो हर युवती और  हर महिला पर जा टिकती हैं, चाहे वह उत्तेजक वेश  में हो या फिर साधारण कपड़ों में। वह उर्वशी को भारतीय वेशभूषा में सजाकर  बाजार में घूमना चाहता है। हल्का मेक-अप, लम्बे वालो का जूड़ा, एक सुन्दर-सी साड़ी, बस। भारतीय  वेशभूषा में जो आकर्षण  है, वह आधुनिकता में कहां? वह उसे बाजार में लेकर घूमना चाहता है तब तक, जब तक लोग अपने घरों को लौटना न शुरू कर दें। वह उसे फव्वारे के पास उसके साथ बैठकर क्वालिटी की आइसक्रीम खाना चाहता है, जहां कई लोग घेरे में बैठे होते हैं और जहां रात उतरे ही रंग-बिरंगे प्रकाश  में फव्वारा भी रंगीन हो उठता है। वह उर्वशी  के साथ पार्कों में घूमना चाहता है और उसकी आसमान में उड़ने की इच्छा भी हो आती है।
वह अस्पताल में बिस्तर पर अर्द्धनिद्रा में कब तक सोया रहा, उसे भान नह हुआ। इस बीच अपने अवचेतन मन में उसने सुन्दरी उर्वशी  के संग बहुत सुखद क्षण बिताए।
वह धीरे-धीरे उठा। श्वास-प्रश्वास  सामान्य थी, पर छाती में अब तक एक बोझ-सा अनुभव हो रहा था। बिस्तर से उतरकर उसने पांव में रबर की चप्पल फंसायी और जाने को हुआ। उसकी नजर बिस्तर पर पड़ी, जहां खून के दाग लगे हुए थे जो उसके नहीं किसी और के थे और सूखकर स्थायी जगह बना चुके थे।
इमरजेंसी वार्ड के अन्दर उसने चारों ओर निगाह दौड़ायी। उसे लेकर कुल चार मरीज उस वार्ड में थे। उनमें से दो दर्द समेत या दर्द रहित नींद में थे। उनके संग आए लोग भी ऊंघ  रहे थे। तीसरा मरीज अकेला था। अस्पताल के लाल कम्बल को उसने दूर फेंका हुआ था  और बायीं करवट लेटा अपना दायां चेहरा अपनी दायीं हथेली पर रखे एक टक उसे देखे जा रहा था। उसे उसका चेहरा बड़ा डरावना लगा। आँखें जैसे बाहर निकली आ रही थीं। वह कराहता जा रहा था। शायद वह भी उसकी तरह इस वक्त अकेला था, इसलिए उसे कष्ट  का अनुभव अधिक ही हो रहा था।
उसने एक बार फिर इत्मीनान से उन मरीजों और उनकी देख-रेख करनेवालों पर नजर डाली और धीरे-धीरे वार्ड से बाहर निकल आया। चारों ओर बीमार-सी शान्ति थी। बीच-बीच में कहीं दूर से किसी-किसी के रहकर खांसने की आवाज आ रही थी। वार्ड से निकलते ही उसकी निगाह पारदर्शी शीशे के बाहर सड़क पर फैली रोशनी और अंधेरे के मिश्रण में जा अटकी। एक पेड़ के नीचे अंधेरे में चार-पांच लोग सिमटे-गुमटे सो रहे थे। पास ही एक रिक्शावाला भी सवारियों की बैठने वाली सीट पर अधपसरा लेटा हुआ था।
उसने मन-ही-मन सोचा, क्या इस गहरी रात में थककर गहरी नींद में सोये उस रिक्शेवाले को जगाने की हिम्मत वह जुटा पाएगा?
उसके पांव ‘सिस्टर्स-रूम’ की ओर बढ़ गए। हल्के खांसते हुए वह अन्दर चला गया। उर्वशी  उस समय उसी तरह रातरानी-सी खिली एक स्वेटर बुन रही थी। वह कुछ घबड़ाया और फिर उदास हो गया। पता नहीं अपने पति के लिए बुन रही है या अपने जैसे किसी प्यारे बच्चे के लिए या कोई मंगेतर भी हो सकता है।
उर्वशी ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और पूछा, ‘‘अब कैसा महसूस कर रहे हैं आप?’’
‘‘ठीक हूं।’’
उसी क्षण उसके मन में दूसरा ख्याल आया। नहीं-नहीं इसकी शादी अभी नहीं हुई है और उसका मंगेतर भी नहीं होगा। उससे कुछ बातें करना चाहता था वह। पूछना चाहता था कि क्या उसकी शादी हो चुकी है? दूसरी सिस्टर एक फाइल से इंजेक्शन  में दवा भर रही थी। वह सिर्फ इतना ही कह पाया--- ‘‘छाती में दबाव अनुभव हो रहा है।’’
‘‘कोई बात नहीं। सुबह आकर ओ.पी.डी. में दिखा लीजिएगा।’’
उसने मुश्कुराकर
उर्वशी को अलविदा का संकेत दिया और ‘थैंक यू’ कहकर कमरे से बाहर निकल आया।
अस्पताल से निकलकर जैसे ही वह खुली हवा में आगे बढ़ने लगा  कि उसे अपनी सांस फिर से कुछ-कुछ उखड़ती लगी। वह फिर से अस्पताल के अंदर चला गया। ठीक उसी तरह जैसे जेल से लम्बी सजा काटकर कैदी खुली हवा में आकर घबरा जाता है और फिर से जेल में जाने को इच्छुक हो उठता है।
वह इमरजेंसी वार्ड से बाहर सुनसान कॉरीडोर में आगे बढ़ता गया। कभी दायें मुड़ता तो कुछ आगे चलकर बायें। उसकी आंखें फिर से बोझिल होने लगीं। अन्त में वह अस्पताल के पूर्वी द्वार पर था, पर बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। द्वार पर तीन-चार एम्बुलेंस, कुछ जीप और कारें खड़ी थीं। वह एक बेंच पर जाकर इत्मीनान से लेट गया। इस वक्त किसी को इन बेंचों की जरूरत नहीं है और न ही कोई उसे टोक सकता है। आखिर वह मुश्किल से सांस ले रहा है।
वह सिर के नीचे रबर की चप्पल दबाकर बायीं करवट लेट गया पर उसे कुछ असुविधा हुई। चप्पल निकालकर उसने सिर के पीछे रखा और फिर अपनी बांह मरोड़कर उसका सिरहाना बना लिया। उसे कुछ आराम मिला। सांस भी सामान्य थी। उसे थोड़ी ही देर में नींद आ गई.... एक गहरी नींद। अब वहां
उर्वशी नहीं थी, एक शून्य था । शायद सपने भी हों। उसे कभी सपने याद नहीं रहते, न बुरे और न ही अच्छे। हां, कभी-कभी सपनों में उसकी नींद टूट जाती है और उसकी आंखों में आंसू होते। कोई बड़ी रेल-दुर्घटना या विमान का ध्वस्त होना। कई लोगों के एक साथ मरने पर उसे बहुत रोना आता है --हकीकत में भी।
सुबह जब अस्पताल के परिसर में छायादार पेड़ों से चिड़ियों की चहचहाने की आवाजें आने लगीं, तब उसकी नींद टूटी। इक्का-दुक्का वाहन भी अस्पताल में उंघते हुए आ रहे थे। वह उठा, आंखें मिचमिचायीं और पूर्व के प्रवेशद्वार से सड़क पर आ गया। बूढ़े और प्रौढ़ लोग कनटोप, मफलर और स्वेटर पहने सुबह की सैर को निकल रहे थे। उनमें से कुछ के हाथ में छड़ी, बेंत या छोटा डंडा था। कुड के साथ झबरे कुत्ते भी थे।
उसके बगल से अखबारवाला हैंडल से लटके झोले और कैरियर में दबोचे ढेर सारे अखबारों के साथ निकल सर्र से निकल गया। आजकल समाचार भी ऐसे ही होते हैं, तेजी से बगल से निकलते हुए-- उसने मन-ही- मन सोचा।
उसने सड़क के किनारे  बने एक बिना छत के स्टॉप पर आकर एक लगभग खाली बस ली और अपने घर चला आया। उसका चचेरा बड़ा भाई अभी तक लम्बी ताने लेटा हुआ था। दरवाजा उसी तरह भिड़ा हुआ था, जैसे वह रात दस बजे के करीब बन्द करके गया था। ऐसे सुस्त लोगों के घर हवा और धूप भी आने से कतराती है।
अपने साथ वह एक पाव रोटी और पॉलीथिन में बन्द दूध का पैकेट भी  लेता आया था। उसने गैस जलाकर पहले दूध को गर्म किया और फिर अलग से एक गिलास दूध में हल्की-सी चायपत्ती डालकर उसे उबाला। चाय मिले दूध को एक गिलास  में उड़ेलकार वह दो स्लाइस के साथ अपने बिस्तर पर आ गया। इस सुबह के नाश्ते  के बाद उसने  एक ब्रांकोडायलेटर ( श्वास की टिकिया ) ली और बिस्तर पर लेट गया।
.(क्रमशः - आगे की कहानी के लिए प्रतीक्षा करें )

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन शुरुआत, लेकिन ये 'मिलते हैं ब्रेक के बाद' वाला सिलसिला ठीक नहीं।

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