लघुकथा- गांधीगिरी




सरकारी कार्यालय में महीनों से अटके पड़े अपने काम को करवाने का नुस्खा बुजुर्ग के हाथ लग चुका था।
वे सम्बंधित रिश्वतखोर बाबू के पास पहुंचे और एक-एक कर अपनी ऐनक, टोपी, कमीज, बनियान, पतलून उतारने लगे। बाबू चुपचाप उन्हें देखे जा रहा था। उसके चेहरे पर न कोई सिकन थी और न कोई प्रतिक्रिया।
हारकर बुजुर्ग ने अपना अंतर्वस्त्र  भी उतारकर उसके टेबल पर रख दिया।

उस दिन से बुजुर्ग अस्पताल के मनोरोग विभाग में दाखिल हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. उस दिन से बुजुर्ग अस्पताल के मनोरोग विभाग में दाखिल हैं
    bharastrachar ki charamseema----
    jai baba banaras

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  2. wah ....lage raho munna bhai se ek hi waky me bahar nikal aaye .....begreen laghukatha....badhai

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