बांग्ला लघुकथा

Chandan Chakraborty
सुअर की कहानी

चंदन चक्रवर्ती/ मूल बांग्ला से अनुवादः रतन चंद ‘रत्नेश’


प्रकाशक सिर पर खड़ा था। उसकी एक लघुकथा-संकलन निकालने की योजना थी। डेढ़ सौ शब्दों की एक लघुकथा लिखने के लिए मुझसे कहा। मैंने कहा, ‘‘लेखकों को आप दर्जी समझते हैं क्या? माप कर कथा लिखूं?’’

--अरे जनाब, समझते क्यों नहीं आप? यह माइक्रोस्कोपिक युग है। इसके अलावा अणु-परमाणु से ही तो मारक बमों को निर्माण होता है।

--इसका मतलब है कि कथा परमाणु बम की तरह फटेगी। भाई मेरे, अणु-परमाणु से थोड़ा हटकर नहीं सोचा जा सकता?

--वह कैसे?

--यानी कि पटाखा-कथा। थोड़ी आकार में बड़ी होगी। पटाखे की तरह फूटेगी।

प्रकाशक चला गया। मेरे मस्तिश्क में लघुकथा नहीं आती है। बीज डालकर सींचना पड़ेगा। अंकुर फूटेंगे, पेड़ बनेंगे। उसके बाद फूल-फल और फिर से बीज। इससे बाहर कैसे जा सकता हूं? अंततः कुछ सोच-समझकर लिख ही डाला -----

‘‘दो सुअर थे। बच्चे जने दस-बारह। सुअर के बच्चों ने निर्णय लिया कि सारी दुनिया को सुअरों से भर देंगे। पहले उन्होंने निश्चित किया कि सिर्फ भादों में कुत्तों की तरह बच्चे जनेंगे। ....हजार-हजार सुअर। कीड़ों की तरह किलबिला रहे हैं। अब पशुशाला बनाएंगे। वह भी बनाया। पशुशाला के नियम-कानून बने। देश सुअरमय हुआ। उनकी आयु पांच-दस वर्षों की है, पर ये रबर की तरह हैं। उम्र खिंचती चली जा रही है। बीस-पच्चीस-सत्ताइस-तीस और उससे भी अधिक। मजे से उनका घर-संसार चल रहा है।’’

प्रकाशक ने सुनकर कहा, ‘‘एक इन्सान की कहानी नहीं लिख सके?’’

मैं चौंक उठा, ‘‘तो फिर मैंने यह कहानी किसकी लिखी?’’

2 टिप्‍पणियां:

  1. चंदन चक्रवर्ती ने अच्छा कथ्य उठाया है, लेकिन मेरी दृष्टि में यह एक नहीं दो अलग-अलग लघुकथाएँ हैं। पहली लघुकथा का समापन--'इसका मतलब है कि कथा परमाणु बम की तरह फटेगी। भाई मेरे, अणु-परमाणु से थोड़ा हटकर नहीं सोचा जा सकता?' पर हो जाता है और यह अपनी बात कह जाती है। 'सुअर की कहानी' का उत्तरांश दूसरी लघुकथा है। दोनों रचनाओं को शैल्पिक विन्यास के द्वारा सँवारा जाना चाहिए। दोनों की व्यंजना भिन्न है।

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