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नये साल की पूर्व संध्या पर
मेरी शुभकामनाएं..........
रात देर से सोये हम
आलोकित शहर की साज-सज्जा में
रात के जब बारह बजे थे
ठंड में दबी कोयले की आंच
कुनमुनाई थी जरा-जरा
नामचीन सड़क के चौराहे के आस-पास।
उघड़ी हुई मैली स्वेटर में दुबके
आलोकित शहर की साज-सज्जा में
रात के जब बारह बजे थे
ठंड में दबी कोयले की आंच
कुनमुनाई थी जरा-जरा
नामचीन सड़क के चौराहे के आस-पास।
उघड़ी हुई मैली स्वेटर में दुबके
अधनंगे बच्चों की नींद में
पटाखों और होटल के शोर ने खलल डाला
बुड़बुड़ाए थे बुढ़ाते लोग
अधकचरी सोच और संस्कृति पर।
रात देर से सोये हम
उपहारों के पैकेट पर लिखते रहे
दिशाहीन भटक रहे नाम
लिस्ट बनाई
इंसोमेनियाग्रस्त और डिप्रेस्ड लोगों की
ताकि थोड़ी-सी नींद दे सकें उन्हें
नये साल के उपहार में।
रात देर से सोये हम
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी
असमय ही मरे थे असंख्य
खुर्दबीनी गलतियों से लोग
तरह-तरह के वायरसों से आक्रांत
मन और शरीरों के लिए
प्रार्थना करते रहे देर रात तक
रात देर से सोये हम।
.....................................पटाखों और होटल के शोर ने खलल डाला
बुड़बुड़ाए थे बुढ़ाते लोग
अधकचरी सोच और संस्कृति पर।
रात देर से सोये हम
उपहारों के पैकेट पर लिखते रहे
दिशाहीन भटक रहे नाम
लिस्ट बनाई
इंसोमेनियाग्रस्त और डिप्रेस्ड लोगों की
ताकि थोड़ी-सी नींद दे सकें उन्हें
नये साल के उपहार में।
रात देर से सोये हम
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी
असमय ही मरे थे असंख्य
खुर्दबीनी गलतियों से लोग
तरह-तरह के वायरसों से आक्रांत
मन और शरीरों के लिए
प्रार्थना करते रहे देर रात तक
रात देर से सोये हम।
कुमार विकल की शुभकामनाएं
रात भर बहुत कम सोता हूं
सुबह अखबार पढ़ने के बाद
गुसलखाने में अक्सर रोता हूं
दिसम्बर की गुनगुनी धूप को
अखबार की खतरनाक खबरें
जनवरी की बर्फीली रातों में बदल देती है
और अपने छोटे भाई के लिए
स्वेटर बुन रही बहन से
सलाइयां छीन लेती है।
खैर, मैं नये वर्श की शुभकामनाएं
उसी बहन को भेजता हूं।
दिल्ली का कवि हिमाचल में
दिल्ली का कवि हिमाचल में
परौंठेवाली गली ढूंढता है
जबकि यहां की हर गली और कूचे में
पकते हैं परौंठे।
आलू के ही नहीं,
मूली, मेथी, गोभी और उन सबके
जिनके बारे में
दिल्ली वाले सोच तक नहीं सकते।
दिल्ली वाले सोच तक नहीं सकते।
दिल्ली का कवि हिमाचल में आकर
अपने आप को पहाड़ से भी
ऊँचा समझने लगता है
ऊँचा समझने लगता है
पहाड़ हंसता है
आज आया है ऊँट उसके नीचे।
दिल्ली का कवि नेता से भी बड़ा होता है
मंच पर उसके सामने मुस्कुराता है
और उनकी अनुपस्थिति में गरियाता है
शाम को बिस्तर के नीचे लुढ़कती बोतल
इस बात पर ठहाके मारकर हंसती है।
एक अनजानी-सी छोटी गलती पर
दिल्ली का कवि हिंस्र हो उठता है
और यह दलील पेश करने लगता है कि
घोड़ा जानबूझकर दुलत्ती मारे या अनजाने में
हाड़-मांस के मानुष को हिंस्र जानवर में तब्दील हो जाना चाहिए
दिल्ली के कवि को शायद यह पता नहीं
पहाड़ की औरत तक हिंस्र से हिंस्र जानवरों को
लहूलुहान कर सकती है
मात्र एक दराटी से।
दिल्ली के कवि का मुखौटा
पहाड़ पर आते ही अपने आप उतर जाता है
यहां का पानी एक मिनरल वाटर से भी शुद्ध है।
कविता- पेड़ से गिरे पत्ते
पेड़ पर से
जहाँ-जहाँ से गिरे थे पत्ते
पतझड़ में
वहाँ-वहाँ फूटती कोपलों से
झाँक रहें हैं नन्हें -नन्हें
कोमल चिकने पात ...
पत्ते जो झडकर गिरे थे
पसरे थे धरती पर दूर-दूर तक
कुछ जले, कुछ मिट्टी में दफ़न हुए
न वे हिंदू थे, न मुसलमान
फिर भी इसी मिट्टी में समाये
अपना-अपना भाग्य उनका....
पर कभी कुछ खत्म हुआ है क्या?
मरा है कभी क्या कोई
देह मरती है आत्मा नहीं
आत्मा कोंपल की तरह
लेती रहती है पुनर्जन्म..........
लिखे हुए शब्द
कोई अर्थ नहीं
अगर वे
सिगरेट की
आखरी कश की तरह
जमीन पर फेंककर
पांव से कुचल दिए जायें।
लिखे हुए शब्दों की ताकत
ऐसी हो कि बुझता हुआ दीया
फिर से सुलग जाय
अन्याय सहते
किसी व्यक्ति के साथ
न्याय हो जाय
या जी जाय फिर से
कोई मरता हुआ आदमी।
मैं उन शब्दों को
सहेजना जरूरी समझता हूं
जो चमकते रहते हैं
तारों की तरह
अनंतकाल तक,
जिसके माध्यम से
सुन्दरता को
बचाए रखने की
हर पल
कोशिश की जाती है।
(चित्र : सूरज जसवाल )
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